आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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| DOB | 1967-08-15 |
| Martyr | Battle Casualty |
मेजर आशीष भटनागर, "शौर्य चक्र" (मरणोपरांत) का जन्म 15 अगस्त 1967 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में हुआ था। वे सेना में शामिल हुए और उन्हें 6 सिख लाइट इन्फेंट्री में नियुक्त किया गया। 1997 के दौरान उनकी यूनिट पंजाब के पठानकोट क्षेत्र में तैनात थी। 16 अगस्त 1997 को एक ऑपरेशन के दौरान मेजर आशीष भारत-पाक सीमा के पास गुरदासपुर में ऑपरेशनल ड्यूटी पर थे। इसी दौरान उनके नौ साथियों को ले जा रही नाव रावी नदी में पलट गई। उन्होंने अपने बेहतर कमांडो कौशल एवं अदम्य साहस का प्रदर्शन करते हुए अपने साथियों को बचाने के लिए तेज धारा में छलांग लगा दी। उन्होंने अपनी लाइफ जैकेट दूसरे अधिकारी को दे दी और उन्हें बचा लिया। इसी दौरान उन्होंने एक नायक को भी बचा लिया लेकिन खुद नदी के तेज बहाव में फंस गए और वीरगति को प्राप्त हो गए। मेजर आशीष भटनागर को उनकी विशिष्ट बहादुरी, अनुकरणीय साहस और अपने साथियों के लिए सर्वोच्च बलिदान के लिए वीरता पुरस्कार, "शौर्य चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Major Ashish Bhatnagar SC को उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन!
| DOB | 1968-08-16 |
| Martyr | Battle Casualty |
कैप्टन अरुण सिंह जसरोटिया, अशोक चक्र, सेना मेडल का जन्म 16 अगस्त 1968 को पंजाब के पठानकोट जिले के सुजानपुर गांव में हुआ था। 17 दिसम्बर 1989 को वे सेना में शामिल हुए और उन्हें 8 बिहार रेजिमेंट में नियुक्त किया गया। अपनी यूनिट के साथ कुछ समय तक सेवा करने के बाद उन्हें 9 पैरा (स्पेशल फाॅर्स) में नियुक्त किया गया। 1992 के दौरान उन्होंने जम्मू-कश्मीर के बारामूला जिले के पट्टन तहसील के तिलगाम में एक ऑपरेशन में पांच कट्टर आतंकवादियों को मार गिराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जिसके परिणामस्वरूप उन्हें सेना मेडल से सम्मानित किया था। 1995 के दौरान कैप्टन अरुण सिंह जसरोटिया की यूनिट उग्रवाद विरोधी अभियानों के लिए जम्मू-कश्मीर में तैनात थी । 15 सितम्बर 1995 को कैप्टन अरुण की यूनिट को खुफिया सूत्रों से लोलाब घाटी की एक गुफा में 20 आतंकवादियों की मौजूदगी के बारे में जानकारी मिली। कैप्टन अरुण के नेतृत्व में आतंकवादियों को पकड़ने के लिए खोज और विनाश अभियान शुरू किया गया। इसी दौरान दोनो ओर से भीषण मुठभेड़ हुई जिसमें कैप्टन अरुण सिंह जसरोटिया और उनकी टीम ने सभी 20 आतंकवादियों को मार गिराया। परन्तु इसी दौरान कैप्टन अरुण सिंह जसरोटिया को गोलियां लगीं और वे गंभीर रूप से घायल हो गये। उन्हें इलाज के लिए दिल्ली के आर एंड आर अस्पताल में भर्ती किया गया जहाँ 26 सितम्बर 1995 को वे वीरगति को प्राप्त हो गये। कैप्टन अरुण सिंह जसरोटिया को उनके उत्कृष्ट साहस, कर्तव्य के प्रति समर्पण और सर्वोच्च बलिदान के लिए 26 जनवरी 1996 को देश के सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार "अशोक चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से Capt Arun Singh Jasrotia AC SM को उनकी जयंती पर बारंबार नमन!
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







