कैप्टन हरीश चंद्र गुजराल “वीर चक्र” (मरणोपरांत), का जन्म 6 अगस्त 1941 को हज़रो में हुआ था। वे जाट रेजिमेंट की 5 जाट में सेकंड लेफ्टिनेंट के पद पर तैनात थे। भारत-पाक युद्ध के दौरान, 8 सितंबर 1965 को सियालकोट सेक्टर के 'रुरकी कलां' में उनकी कंपनी आगे बढ़ रही थी, तभी अचानक पाकिस्तानी वायुसेना के सैबर जेट लड़ाकू विमानों ने आसमान से उनकी टुकड़ी पर भारी बमबारी और गोलीबारी शुरू कर दी। खुले मैदान में हवाई हमले के बीच उनके जवानों की जान भारी खतरे में थी। अपने सैनिकों को सुरक्षित बचाने के लिए कैप्टन गुजराल ने अपनी परवाह किए बिना तुरंत मोर्चा संभाला। उन्होंने एक जीप पर लगी RCL (रिकॉइललेस) गन को खुद ऑपरेट करना शुरू किया और सीधे दुश्मन के लड़ाकू विमान (सैबर जेट) पर निशाना साधा। वे अकेले ही उस लड़ाकू विमान का ध्यान अपनी ओर खींचने और उसे खदेड़ने में जुट गए ताकि उनके जवानों को सुरक्षित स्थान पर जाने का मौका मिल सके। जब वे विमान पर निशाना लगा रहे थे, तभी सैबर जेट की मशीन गन से निकली गोलियों का एक घातक हिस्सा सीधे कैप्टन गुजराल के सीने पर लगा। इस कारण 24 वर्ष की अल्पायु में वे मौके पर ही शहीद हो गए। कैप्टन हरीश चंद्र गुजराल को उनके अदम्य साहस, असाधारण नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए "वीर चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया।
स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविधालय की ओर से कैप्टन हरीश चंद्र गुजराल, वीर चक्र (मरणोपरांत) को उनकी जयंती पर नमन !




