लेफ्टिनेंट अभय पारीक का जन्म 13 अगस्त 1977 को श्रीमती प्रभा पारीक और श्री के.एस. पारीक के घर हुआ था। अपने छोटे लेकिन शानदार जीवन में लेफ्टिनेंट अभय ने बचपन (स्कूल के दिनों) से लेकर युवावस्था (कॉलेज) तक अपनी प्रतिभा दिखाते हुए कई प्रशंसाएं और पुरस्कार जीते। अपने स्कूल के दिनों के दौरान उन्हें नई दिल्ली में एक अंतर-स्कूल प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ वाद्य संगीतकार और गायक का पुरस्कार दिया गया। सर्वश्रेष्ठ तबला वादक का पुरस्कार मिला और खेल के क्षेत्र में विशेष रूप से बास्केटबॉल और वॉलीबॉल में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। उन्होंने अपने कॉलेज के दिनों में भी पुरस्कार बटोरना जारी रखा और कॉलेज में सभी के चहेते बन गये। कॉलेज में उनके कार्यकाल के दौरान उन्हें प्रतिष्ठित 'गिब्सन पुरस्कार' दिया गया था जो जीवन के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्र को प्रतिवर्ष प्रदान किया जाता। जीसीए अजमेर में और सर्वश्रेष्ठ एनसीसी कैडेट भी चुना गया। वह बॉक्सिंग चैंपियनशिप में लगातार तीन बार स्वर्ण पदक विजेता भी रहे।
लेफ्टिनेंट अभय को सितंबर 2000 में 69 फील्ड रेजिमेंट आर्टिलरी, 'द क्वीन ऑफ वॉर' में भारतीय सेना में नियुक्त किया गया था। अकादमी से आर्टिलरी रेजिमेंट में कमीशन के तुरंत बाद उन्हें एलओसी के पास जम्मू-कश्मीर में तैनात किया गया था।
ऑपरेशन पराक्रम के दौरान लेफ्टिनेंट अभय की यूनिट को एलओसी के पास दुश्मन की चौकी से लगभग 100-150 मीटर की दूरी पर तैनात किया गया था। संसद पर हमले के बाद 'ऑपरेशन पराक्रम' चलाया गया और इसके परिणामस्वरूप दोनों देशों के बीच अघोषित युद्ध की स्थिति पैदा हो गई। लेफ्टिनेंट अभय को स्थिति की निगरानी करने और ऑपरेशन योजना के अनुसार जवाबी कार्रवाई करने के लिए अपने सैनिकों के साथ फॉरवर्ड ऑब्जर्वेशन ऑफिसर के रूप में तैनात किया गया था।
10 जून 2002 को जैसे ही सीमा पार से गोलीबारी बढ़ी लेफ्टिनेंट अभय हरकत में आए और दुश्मन की चौकी पर बड़े पैमाने पर तोपखाने से हमला किया जिसके परिणामस्वरूप दुश्मन को जवानों और सामग्री के मामले में भारी नुकसान हुआ। लेकिन दुर्भाग्य से भीषण गोलीबारी के दौरान लेफ्टिनेंट अभय दुश्मन की एंटी-टैंक मिसाइल की चपेट में आ गए और गंभीर रूप से घायल हो गए। हालाँकि पोस्ट से हटने के दौरान उन्होंने बिना रुके अपने सीओ और वरिष्ठ अधिकारियों को उचित सलामी दी सैनिकों से हाथ मिलाया। अपने सैनिकों से उनके अंतिम शब्द थे- "मैं वापस आऊंगा, मैं वापस आऊंगा"। लेफ्टिनेंट अभय ने बाद में दम तोड़ दिया और इस तरह मातृभूमि की सीमा की रक्षा करते हुए शहीद हो गए।
हालाँकि, लेफ्टिनेंट अभय पारीक ने अपने परिवार के सदस्यों के जीवन में एक खालीपन पैदा कर दिया है, लेकिन एक असाधारण अधिकारी और एक बहादुर सैनिक के रूप में वह आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करते रहेंगे।
स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविधालय की ओर से लेफ्टिनेंट अभय पारीक को उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन !




